History

विश्वविद्यालय का निगमन –
कुलाधिपति, प्रथम कुलपति, विश्वविद्यालय के प्रबंध बोर्ड और विद्या परिषद् के प्रथम सदस्य और ऐसे सभी व्यक्ति, जो इसके पाश्चात् ऐसे अधिकारी या सदस्य हो जाते हैं, जब तक वे ऐसा पद या सदस्यता धारण किये रहते हैं, बीकानेर विश्वविद्यालय के नाम से एक निगमित निकाय का गठन करेंगे और उसका शाश्वत उत्तराधिकार और एक सामान्य मुद्रा होगी और उस नामे से वह वाद ला सकेगा और उस पर वाद लाया जा सकेगा।

विश्वविद्यालय, विश्वविद्यालय के प्रयोजनों के लिए जंगम और स्थावर दोनों प्रकार कि संपत्ति अर्जित और धारित करने, ऐसी किसी भी जंगम या स्थावर संपत्ति को, जो निहित हो या उसके द्वारा अर्जित कि जाये, पट्टाकृत, विक्रित या अन्यथा अंतरित या व्ययनित करने और संविदा करने और इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए आवश्यक अन्य समस्त बातें करने के लिए सक्षम होगा !

परन्तु ऐसी संपत्ति का ऐसा कोई भी पट्टा विक्रय या अंतरण राज्य सरकार के पूर्व अनुमोदन के बिना नहीं किया जायेगा।

मुख्यालय
विश्वविद्यालय का मुख्यालय बीकानेर में होगा जो कुलपति का मुख्यालय होगा।

अधिकारिता
(1) तत्समय प्रवृत किसी भी विधि में अंतर्विष्ट किसी बात के होने पर भी किन्तु राजस्थान विश्वविद्यालय अधिनियमए १९४६ राजस्थान कृषि विश्वविद्यालय बीकानेर अधिनियम, १९८७ (१९८७ का अधिनियम सं. ३९), राजस्थान संस्कृत विश्वविद्यालय अधिनियम, १९९८ (१९९८ का अधिनियम सं. १०), महाराणा प्रताप कृषि और प्रोद्योगिकी विश्वविद्यालय उदयपुर अधिनियम, २००० (२००० का अधिनियम संण् ८) और राजस्थान आयुर्वेद विश्वविद्यालय अधिनियम, २००२ (२००२ का अधिनियम सं. १५) के उपबंधों के अध्यधीन रहते हुएए विश्वविद्यालय कि अधिकारिता का प्रसार, राजस्थान भू.राजस्व अधिनियम, १९५६ (१९५६ का अधिनियम संण् १५) के उपबंधों के अधीन राज्य सरकार द्वारा यथा.अधिसूचित, राजस्थान राज्य के बीकानेर खंड के भीतर के समस्त घटक, संबद्ध या स्वायत्त महाविद्यालयों संस्थानों, संस्थानों और विभागों में और राजस्थान राज्य के भीतर के ऐसे अन्य घटक, संबद्ध या स्वायत्त महाविद्यालयों, संस्थानों, संस्थाओं और विभागों में भी होगा जो राज्य सरकार द्वारा, राजपत्र में अधिसूचना द्वाराए विनिर्दिष्ट किये जायें।

िश्वविद्यालय के उद्देश्य
विश्वविद्यालय अन्य प्रयोजनों के साथ-साथ, निम्लिखित प्रयोजनों के लिए स्थापित और निगमित किया हुआ समझा जायेगा –
विद्या की विभिन्न शाखाओं में शिक्षा देने के लिए उपबन्ध करनाय और
विद्या की समस्त शाखाओं में अनुसन्धान को अग्रसर करना।

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